सफर फेसबुक से शुरू हुई और शादी में बदल गई

बात तब की है जब मैं 12 वीं की पढ़ाई पूरी कर भागलपुर से अपने घर वापिस आया हमें ठीक ठीक याद है वह वर्ष 2012 का रहा होगा अगले कुछ दिन हमें घर पर ही रहना था इस बीच हमें काफी वक्त मिलने लगा था, हमने वर्ष 2011 में एक एकाउंट फेसबुक पर बनाया था पर वक्त की कमी और फेसबुक की ज्यादा ट्रेंड ना होने के कारण फिलहाल इस्तेमाल बंद कर दिया था, वापिस भागलपुर से आने के बाद हमने सेमसंग के चैम्प फोन में अपना फेसबुक को लॉगिन किया और फिर शुरू हुई 2G डाटा स्पीड में अपनी फेसबुक चलाने की 4G स्पीड फिर क्या था अब सोते जागते फेसबुक, वजह यह था की हमें फेसबुक पर एक लड़की मिली जिसको हमने देखने और उसके प्रोफाईल विजिट से यह तो समझ लिया था की यह (काल्पनिक नाम प्रिया) अपने शहर की ही है। पहला मैसेज हमने किया जवाब आने में बहुत वक्त ना लगा और फ़िर शुरू हुई दो अंजाने के बीच की वो पहली बात सब कहां से हो कैसे हो क्या करते हो हमको जानते हो उस शहर में तुम्हारा घर किधर है, और आज तक हमने तुमको देखा नहीं था फिर क्या था बात बस इतना ही होकर बात ना रही अब ये रोज मर्रे की हो गई थी, कैसे हो खाना खाया एक दूसरे का ख्याल रखना मानो एक दूसरे के हो गए हो, खैर आगे एक दूसरे को समझ रहे थे ये वर्ष 2014 से 2015 में पहुंच गया, अब तक शायद प्यार हो गया था एक दूसरे से एक दूसरे को वो वक्त वक्त पर अलार्म सा बजना की बात भी करनी है देर रात तक बात करना कोई सार ना होते हुए भी रात रात भर जागकर बात करना।

यहां से आगे बढ़े पर कुछ बताना भूल गया था बात होने की शुरुआत दौर में ही (प्रिया) ने हमें बता दी थी की हम शादी शुदा है और हम तुम्हारे शहर के जरूर है पर वो शहर अब मेरे लिए अपना ना रहा बस हम भी बांकियो के तरह घूमने कुछ दिन के लिए जा सकते है बस और उसकी अपनी शहर जहां है वह अपनी आगे की जिंदगी उसी शहर गुजारेगी वो तकरीबन मेरे शहर से 110, 120 किलोमीटर की दूरी में होगी, हमने भी यह सबकुछ जानते हुए की (प्रिया) शादी शुदा है फिर भी उसके साथ आगे बढ़ने का फैसला किया, 
अब जब बातें होती तो वो बीच बीच में हमसे एक बात पूछ बैठती थी की अच्छा ये बताओ "तुम्हारी शादी जब होगी तो हमें भूल तो नहीं जाओगे ना या शादी हो जाने के बाद बदल तो नहीं जाओगे ना" पर हमने उन से यह बात शुरुआती दौर में नहीं बता पाया था की हम भी शादी शुदा है और (प्रिया) हमसे भी बात बात में पूछ लेती थी पर हम झूठ बोल गए थे फिर क्या था जब एक बार झूठ बोल गए थे तो उस झूठ को सच बनाने के लिए हम बात बात में झूठ बोल रहे थे पर हां हमने भी कुछ दिन बीत जाने के बाद इस सच्चाई से रूबरू कराना चाहा पर डर ये था कि उसे खो न दें ये सच्चाई बताकर और सच बता पाने की हिम्मत भी जुटा नहीं पाया फिर जब कभी वो सवाल करती की शादी के बाद हमें भूल जाओगे ना तो हम भी इशारा इशारा में बोल जाते थे की मान लो शादी हो गई है मेरी पर वो महज आगे की बात समझ कर और तत्काल को Exampal समझ कर बात आगे बढ़ा देती थी ।
अब बस वो भी और इधर हम भी इस ख्वाब को सजाने में लग गए की कब वो मेरे शहर आए और एक रोज यह वक्त भी आ गया,  इस बीच हमने एक जॉब करना शुरू कर चुका था फिर वो वक्त भी आ गया जब वो मेरे शहर आई और फिर हमलोग मौके के इस तलाश में थे की कब और कहां मिले शहर छोटा होने के कारण ये सब बहुत मुश्किल हो रहा था, और (प्रिया) के घर का उस पर पहरा भी बहुत हार्ड थी मतलब घर से बाहर जाने का घर के कोई सदस्य साथ जरूर होगा तभी इजाजत होती थी पर वह ये जोखिम किसी तरह उठाई और हमसे मिलने अकेले आई,,,
और फिर हमने भी मिला और एक दूसरे को जो अभी तक दूर से समझ रहे थे वो अब करीब से समझना शुरू किया एक दूसरे के करीब होने के बाद मोहब्बत जो पहले हद में हो चुकी थी वो अब हद के पार हो गया , (प्रिया) मेरे शहर में अगले 10 पंद्रह रोज और रुकती इस बीच हमलोग ने वो मौका फिर से तलाशना शुरू कर दिया था क्योंकि पहली मुलाकात में वक्त भी बहुत कम मिल पाया था और एक दूसरे को कुछ समझ भी नहीं पाए थे ,,, पर उसकी एक जायज तमन्ना थी जो हमलोग ने पहली मुलाकात में ये तमन्ना पूरा किया तमन्ना शादी को लेकर था जो कहानी को यहां उलझे हुए छोड़ आगे बढ़ते है ,,
फिर कुछ दिन बाद शहर को (प्रिया) विदाई देने वाली थी और हमलोग की कोशिश की विदाई से पहले एक और मुलाकात हो जाए हालांकि मुलाकात कर लेना मतलब ट्रैफिक नियम का उल्लंघन कर ट्रैफिक पुलिस से बच के निकल लेने जैसी बात थी पर हम सब ने इस हार्ड कोर निगरानी को भी धुंधला कर मुलाकात कर लिए ।
अब बारी आई (प्रिया) को यहां से विदा लेने की और जिद्द उसकी की तुम हमें रेलवे स्टेशन तक छोड़ने जाओगे फिर क्या था मैंने भी तय वक्त में उसे छोड़ने उसके पीछे चल दिया, पहुंचे रेलवे स्टेशन वो मेरे सामने बैठी हुई ट्रेन का इंतजार में भावुक पल नम आंखे मानो कोई जुदा हो रहा हो हमेशा के लिए उसकी मन ही मन इशारा की जब तक ट्रेन ना आ जाए हम उसमें बैठ ना जाएं और ट्रेन खुल ना जाए तुम मेरे सामने रहो बिल्कूल हुआ भी ऐसा ही ,,,, 
अब फिर से वापिस हमलोग फेसबुक की नगरी आएं जहां उसका मैसेज तुम नम क्यों था सुनो ना मेरी मन नहीं हो रहा की तुम्हें छोड़कर जाएं अच्छा तुम चले गया स्टेशन से बहरहाल (प्रिया) पहुंच गई अपनी शहर और फिर हमलोग पहले के जैसे फेसबुक पर अब मन अगले कुछ दिन ना मेरी लग रही थी ना उसकी अब मुहब्बत इतना परवान चढ़ गया था की वो ये बात भूल ही गई थी की शादी भी हो रखी है नतीजा बहुत बुरा हुआ था खैर यहां से आगे बढ़ते है और फिर वही सब पुराने की तरह फेसबुक पर आना मैसेज कोमेंट और फिर कितनी जल्द मुलाकात हो उसकी तलाश , बात उस रोज की है जब मेरी एक पेपर पटना में था और उनसे हमने यह बात शेयर किया था फिर क्या था उसका जिद्द तुम पेपर देकर हमसे मिलते जाना जबकि पटना से दूरी 300 किलोमीटर से ज्यादा ही होगा हमने भी बांकी दोस्तों के साथ उसके शहर और उनसे मुलाकात करने का फैसला कर लिया अब हमारी पेपर खत्म हुई हम दोस्तों के साथ चल दिए वो पल भी आया जब उसके शहर उनसे मिलने पहली दफा पहुंचे थे जबकि शहर जाना पहचाना और पहले से उस शहर को थोड़ा बहुत जाने हुए थे अब वो और हम बस एक मिशन में लग गए की मिला कहां जाए और कैसे इस कश्मकश में एक रोज हमें वहां बिताना हुआ,, 
अगले दिन उसने अपनी दोस्त के दूसरे घर पर ना कोई होने की बात बताई और वहां मिलने को बोली अब रात बिताने से बीत नहीं रही ऐसा लग रहा था मानो रात थम सी गई हो और जितने बेचैन हम थे उतना ही बेचैनी उधर भी थी फिर सुबह हुआ फ्रेश हुए और फिर चैट हुई अब हमलोग 10 बजने का इंतजार वो वक्त भी खत्म हुआ और हम उसके बताए पता पर पहुंचे जहां वो पहले से पहुंच चुकी थी उसकी दोस्त से ये पहली मुलाकात थी फिर उसके दोस्त ने हम सब को एक रूम दी मिलने के लिए एक दूसरे को समझने के लिए हमलोग भी पहली दफा इतने सुकून से मिल रहे थे अगले 1_2 घंटा बिताए हुए पल उसके साथ हमलोग शायद आज तक भुला नहीं पाया और ना ही कभी भुला पाऊंगा फिर वहां से अब हमें चलना था दोस्तों की जोर थी वर्ना मर्जी मेरी भी और उसकी भी की अगले एक रोज और रुक जाओ ये वक्त भी कम पर गया तुमसे मिलने में पर खैर फायनली निकल दिए हम सब वहां से अंत तह कहानी आज भी जारी है कहानी और भी बांकी है इस कहानी की अगले हिस्सा का इंतजार करें जल्द आएंगे कहानी को पूरा लेकर आप सब के सामने।
धन्यवाद श्रोता😊

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